बस यूँ ही !

Thursday, May 26, 2005

कुत्‍ते चले फिल्‍म की ओर

यह कविता मेरी नही है, कहीं से मिल गयी थी, तो यहाँ चिपका दी

एक समय की बात सुनाऊं छोटी सी है कहानी |
दो कुत्तों ने एक बार पिक्चर देखन की ठानी ||

पहुंचे दोनो फिल्म हाल, पर अन्दर कैसे जाएं |
फिल्म शुरु होने को थी, सूझा न कोइ उपाय ||
पहला बोला चुपके से हम अन्दर घुस जाएगें|
सीट के नीचे बैठेगें और फिल्म देख आएगें ||
पर क्या जाने फिल्म देखना था उनकी नादानी |
दो कुत्तों ने एक बार पिक्चर देखन की ठानी ||

दूजा बोला पकड़े गये तो इज्‍जत से जाएगें |
आदमी की मौत बिना वजह ही हम मारे जाएगें ||
एक एक करके देखेगें हम पिक्‍चर आधी आधी |
मै देखूगां मौत विलेन की तुम हीरो की शादी ||
पहला बोला कह दी तुमने ये तो बात सयानी |
दो कुत्तों ने एक बार पिक्चर देखन की ठानी ||

घुस गया पहला सीट के नीचे लगा देखने "शोले" |
देख बसन्‍ती को पर्दे पर बैठ गया मुहँ खोले ||
(पर्दे से धर्मेन्द्र की आवाज आयी "बसन्‍ती इन कुत्तों के सामने मत नाचना")
इन कुत्तों के सामने मत नाचना की सुन के आवाज |
बैठे बैठे कुत्‍ता भाई भूल गये सब काज ||
दौड़ा जैसे धर्मेन्द्र हो उसका दुश्‍मन जानी
दो कुत्तों ने एक बार पिक्चर देखन की ठानी ||

बोला बाहर आकर अन्‍दर हुआ तमाशा भारी |
हीरो ने था देख लिया मुझे और जनता थी सारी ||
नाच रुका था मेरे कारण मैनें अक्‍ल लगाई |
पकड़ा जाता जो मैं अन्‍दर होती खूब पिटाई ||
छुपना तुझे ना आया दूजा बोला बन कर ज्ञानी |
दो कुत्तों ने एक बार पिक्चर देखन की ठानी ||

दूजा जाकर बैठा ही था जोर से बोला गब्‍बर |
"अरे ओ सांभा उठा तो बन्‍दूक और लगा निसाना इस कुत्‍ते पर" ||
इतनी सुनी जो कुत्‍ते ने तो उड़ गये उस के तोते |
वो भी उड़ जाता गर उस के भी पर होते ||
कैसे देख लिया गब्‍बर ने थी उसको हैरानी |
दो कुत्तों ने एक बार पिक्चर देखन की ठानी ||

काँप रहीं थी टांगें थर थर जीभ आई थी बाहर |
बाहर आकर बात बताई उसने तो डर डर कर
जाने केसे देख लिया था मुझको तो गब्‍बर ने |
तेरे कारण नाच रुका था मैं तो चला था मरने ||
अब ना कभी देखेगें पिक्‍चर ये दोनो ने ठानी
दो कुत्‍तों की पिक्‍चर की होती है खत्‍म कहानी||

Thursday, May 12, 2005

क़्या लिखूँ ????

ब्लोग कि शुरुआत तो कर दी, ऑर लोगो ने हौसला आफज़ाई भी कर दी |
अब तो कुछ लिखना ही पड़ेगा, लेकिन क्या लिखू, कुछ समझ मैं नही आ रहा है |
साहित्य के नाम पर अभी तक तो केवल पढ्ता आया हू, जो भी, जहाँ भी मिल गया सुरेन्द्र मोहन पाठक से लेकर प्रेमचन्द, शिवानि य अम्रता प्रीतम तक या लोगो के चिट्ठे, कभी कुछ लिखा नही ऑर न ही कोशिश की, लेकिन लगता है अब तो लिखना ही पड़ेगा |
ळेकिन सामने एक सवाल सुरसा की तरह मुह फैलाये खड़ा है, क्या लिखूँ??

विचार है कि आते ही जा रहे हैँ बेलगाम, समझ मे नही आ रहा है कैसे व्यक्त करुँ?

चलो कुछ सोचता हूँ ..

Wednesday, May 11, 2005

आज ही शुरु किया है

सब महानुभावो के ब्लोग पढ पढ के मन किया कि हुम भी कुछ लिखे तो आगाज़ कर दिया है देखते है कहाँ तक ले जा सकता हूँ